साहित्य सिर्जना

बाबुजी

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किछु अहि तरहेँ हमरा सभके पालैत रहलैथ बाबुजी
अपन मोनक इक्षा सभके मारैत रहलैथ बाबुजी
अहि कारण की हमरा सभके पाएर में नईँ काँट गड़ए
आगाँ आगाँ रास्ता सभके बहारैत रहलैथ बाबुजी

हमरा सभके नवका कपड़ा अपने पुरने धोती में
अहिना दशमी दिवाली होली मनावैत रहलैथ बाबुजी
मोन परैत अछि दादी के जे एकबेर पाएर टूटल
कोरामें लए गँगा स्नान कराबैत रहलैथ बाबुजी

जाधरि रहत ई जिनगी ताधरि सभटा मोन रहत
उँच नीच जे हमरा सभके समझाबैत रहलैथ बाबुजी
निर्मम होई छै एकाकी जीवन तैयो कहता ठीक छी हम
मोनक दर्द आ आखि'क नोर नुकाबैत रहलैथ बाबुजी

एक एक दिन गनैत रहैत छथि केओ त' आब लेत सुधि
मोन में आशा उमेदक चिनगी पजारैत रहलैथ बाबुजी
घर आओत पाएर छुअत मोन भरि सभसँ बात करब
एहने छोट छोट सपना  सजाबैत रहलैथ बाबुजी

जौँ कहबै कि सँगहि चलू तखनो कहाँ मानै बाला
बयस ढ़लल बास कोना तेजब, बुझाबैत रहलैथ बाबुजी
अहि दुआरे शायद कि सँघर्ष करबाक शक्ति भेटए
श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन गावैत रहलैथ बाबुजी

परदेशी पुत्रक पिताके सभतरि ईहे कहानी छै
जीवन सँध्या किछु अहि तरहेँ गुजारैत रहलैथ बाबुजी
किछु अहि तरहेँ हमरा सभके पालैत रहलैथ बाबुजी
अपन मोनक इक्षा सभके मारैत रहलैथ बाबुजी...

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